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Abstract
भारत में स्वतन्त्रता प्राप्ति के पूर्व तथा उसके पश्चात् मुद्रा स्फीति का प्रमुख कारण खाद्य आपूर्ति संकट, प्राकृतिक आपदा संकट, कालाबाजारी, माँग और पूर्ति में होने वाली असमानता आदि रही है। दूसरी तरफ सरकार द्वारा निर्धारित राजकोषीय नीति और त्ण्ठण्प्ण् के द्वारा निर्धारित होने वाली मौद्रिक नीति से भी प्रभावित रही है। इन सभी के बीच विकसित देश के आर्थिक नीति का प्रमुख उद्देश्य, पूर्ण रोजगार, आर्थिक स्थिरता, ऊँची विकास दर रही है और अपनी-अपनी उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए कोई मन्दी से ग्रस्त है तो कोई मँहगाई को अपनी प्रमुख समस्या बता रहा है, जो अब विश्व आर्थिक मंच तक पहुँच गयी है और सम्पूर्ण विश्व के सामने एक चुनौती के रुप में खड़ी है। 1985 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी द्वारा उदारीकरण के मार्ग पर कदम रखा गया और फिर 1991 में पी0वी0 नरसिम्हा राव सरकार के समय पूर्व वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने नयी आर्थिक नीति का उद्घोषणा कीे तथा काफी हदतक प्रतिबन्धो को हटा दिया गया जिसने निश्चित रुप से देश के विकास में एक नयी क्रांति पैदा कर दी। आर्थिक सुधार में आकर्षक जी0डी0पी0 के साथ-साथ भ्रष्टाचार बढ़ा है।