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Abstract
वस्तुतः नारी के बिना समाज की कल्पना करना असंभव है। चूंकि स्त्री और पुरूष दोनों ही समाज के मजबूत आधार स्तम्भ है, इसलिए स्त्री जीवन के हर क्षेत्र मे पुरूष के समान आदर पाने की अधिकारिणी है किन्तु पितृसत्तात्मक समाज अपनी पारम्परिक मान्यताओं को आड़ में स्त्री का सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, शोषण करने के साथ-साथ उसका दैहिक शोषण करने मे ंभी कोई गुरेज नहीं रखता। पितृसत्ता ने स्त्री को उपयोग की वस्तु बना दिया।