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Abstract
वैश्विक स्तर पर पाओलो फ्रेरे 19वीं शताब्दी के शिक्षाविदों और दार्शनिकों में अव्वल थे। वे काण्ट, फिट्टे, शैलिंग, हीगल और जॉन डी.वी. आदि दार्शनिकों एवं शिक्षाविदों से अत्यधिक प्रभावित थे। उनका मानना था कि विश्व के मानवों का उत्थान तब तक संभव नही है जब तक उन्हें वास्तविक ज्ञान से परिचित नहीं किया जाये। इसकें लिए वे चाहते थे कि विश्व के समस्त देशों में एक ऐसा शैक्षिक कार्यक्रम का आयोजन हों जिसमें जन सामान्य के लिए भी शिक्षा की व्यवस्था हो। इस जन शिक्षा के अन्तर्गत उन सभी लोगों को सम्बिलित किया जाये जो साक्षर नही है। वे सदा कहा करते थे कि समाज में सभी प्रकार और सभी वर्ग के लोग रहते हैं जिससे बालक, बालिकों, नारी, पुरूष, पौढ नारी, मजदूर वर्ग के लोग, प्रौढ पुरूष आदि सम्मिलित है। इनमें से कुछ खास वर्ग और आयु के लोगो को शिक्षा देना और दिलाना मात्र दिखावा के लोगों को शिक्षा देना और दिलाना मात्र दिखावा होगा। हमें तो इन सभी वर्ग के लोगों और सभी आयु के लोगों के शिक्षा के सम्बन्ध में सोचना चाहिए। जब तक में सभी वर्ग के जन सामान्य शिक्षित नहीं होगें न तो मानव जाति का विकास होगा और न राष्ट्र का अस्तु जन शिक्षा से सम्बन्धित उन्होंने कई बातों पर बल देने का कार्य किया