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Abstract

स्त्री और पुरूष समान धरातल पर मानव के दो पक्ष हैं। इनका संबंध परस्पर समानता पर आधारित होना चाहिए। लेकिन ये सब आदर्श, किताबों तक ही सीमित रहे। स्त्री-जीवन का यथार्थ कुरेद कर देखा जाये तो स्थिति बहुत ही विवशता, घुटन एवं मानसिक यंत्रणा से युक्त है। ‘‘यथार्थ शक्तियों की सच्ची पड़ताल में जाने को बाध्य कर एक किस्म की पक्षधारता की माँग करता है।’’1 यह द्वंद की लंबी परम्परा की देन होता है।

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