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Abstract

एक समय था जब हमारी धरा अपने पूर्ण यौवन में हरी-भरी थी एवं सम्पूर्ण वातावरण प्रदूषण मुक्त था। शीतल वायु मंद-मंद बहा करती थी। चारों ओर फूलों व फलों से लदे हुए झूमते वृक्ष थे। इतिहास का यह सुंदरतम काल ‘‘वैदिक काल’’ था। वैदिक काल में पर्यावरण शिक्षा के लिये अलग से कोई व्यवस्था नहीं थी। पर्यावरण शिक्षा जीवन के प्रतिदिन के कार्यों व धार्मिक अनुष्ठानों के रूप में जुड़ी थी। प्रकृति और वृक्षों के प्रति अनुराग की पराकाष्ठा प्रकृति संरक्षण की आधार भूमि थी। वैदिक कालीन पर्यावरण शिक्षा धर्म में समाहित शिक्षा थी। उस काल में ऋषि-मुनियों को पर्यावरण के जटिल स्वरूप का सम्यक ज्ञान था। पर्यावरण शिक्षा का मूल उस प्राचीन चिन्तन में छिपा है जब वृक्ष, नदी, पवन एवं सूर्यदेव को ईष्ट समझा जाता था। इसके मूल में अग्रलिखित ये तथ्य हैं- वन भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता के केन्द्र बिन्दु रहे हैं।

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