Main Article Content
Abstract
स्त्री क्या चाहती है ? यह प्रश्न आज से नहीं बल्कि हर युग से हमारे मानस पटल पर उपस्थित रहता है। इस प्रश्न का उत्तर पुरूषों से अधिक स्त्रियों के लिए जानना आवश्यक है। जब तक वह स्वयं नहीं जानेगी कि उसे क्या चाहिए तब तक वे अस्तित्व और अपनी अलग पहचान प्राप्त नहीं कर सकती है। आज की स्त्री में चेतना जाग्रत हुई है। वह अपने मनुष्य होने के भाव को पहचाने लगी है। पितृसतात्मक समाज ने स्त्री को सदैव हाशिए पर रखा है। वह उसे मनुष्य न मानकर मात्र उपभोग की वस्तु मानता आ रहा है। अतीत से लेकर वर्तमान तक हमेशा स्त्री आर्थिक, मानसिक, दैहिक, नैतिक स्तर पर शोषित होती आ रही है। स्त्री का भी अपना जीवन है अतः वह महिमामण्डित होकर नहीं अपितु मनुष्य बनकर जीना चाहती है। स्वतन्त्रता के बाद स्त्री में अपने अधिकारों के प्रति चेतना जाग्रत हुई है।